नाट्य साहित्य में उल्लेखनीय योगदान रहा वीरेंद्र मिश्र का

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Jagranujala.com, मुरादाबाद : प्रख्यात साहित्यकार स्मृतिशेष वीरेन्द्र कुमार मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ‘साहित्यिक मुरादाबाद’ की ओर से दो दिवसीय ऑन लाइन आयोजन किया गया। चर्चा में शामिल साहित्यकारों ने कहा कि वीरेन्द्र कुमार मिश्र का मुरादाबाद के नाट्य साहित्य में उल्लेखनीय योगदान रहा है । राष्ट्र के प्रति समर्पण और हिंदुत्व का भाव जगाने के साथ साथ उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से ऐतिहासिक चरित्रों और घटनाओं को भी प्रस्तुत किया ।

साहित्यकार वीरेंद्र मिश्र का फाइल फोटो


मुरादाबाद के साहित्यिक आलोक स्तम्भ के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ मनोज रस्तोगी ने कहा कि एक जुलाई 1922 को मुरादाबाद में जन्में श्री मिश्र की प्रथम नाट्य कृति छत्रपति शिवाजी वर्ष 1958 में प्रकाशित हुई। उनका कहानी संग्रह पुजारिन वर्ष 1959 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त उनकी नाट्य कृतियां गुरु गोविंद सिंह, सम्राट हर्ष और आचार्य चाणक्य प्रकाशित हुईं । उनकी अप्रकाशित नाट्य कृतियों में शेरशाह सूरी और विक्रमादित्य उल्लेखनीय हैं । नाटक छत्रपति शिवाजी के लिए शारदा विद्यापीठ द्वारा उन्हें साहित्य वाचस्पति उपाधि से सम्मानित किया गया। उनका निधन 28 अप्रैल 1999 को हुआ ।
महाराजा हरिश्चंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ विश्व अवतार जैमिनी ने कहा वीरेंद्र कुमार मिश्र भारतीय संस्कृति, हिंदुत्व और राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत थे। यही भावना उनके संपूर्ण लेखन का आधार थी। भारत के गौरवशाली ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर उन्होंने अनेक नाटकों की रचना कर न केवल इतिहास के पन्नों को प्रस्तुत किया बल्कि आक्रमणकारी मुगलों की संस्कृति से भी वर्तमान पीढ़ी को अवगत कराया।
केजीके महाविद्यालय, मुरादाबाद की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ मीरा कश्यप ने कहा मुरादाबाद के साहित्य की गौरवशाली परम्परा में वीरेंद्र मिश्र जी की कृतियों का अनुपम योगदान है, उन्होंने अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का अद्भुत प्रयास किया है। नजीबाबाद (जनपद बिजनौर) की साहित्यकार दीपिका माहेश्वरी सुमन ने कहा कि वीरेंद्र कुमार मिश्र की कहानियां सुंदर भावनाओं से ओतप्रोत, ‘वेदना’ पर आधारित हैं। डॉ अजय अनुपम ने वीरेन्द्र मिश्र जी से सम्बंधित संस्मरण प्रस्तुत किया।
रामपुर के साहित्यकार रवि प्रकाश ने कहा कि वीरेंद्र कुमार मिश्र ऐसे कलमकार रहे जिनमें राष्ट्रीयत्व का भाव प्रबल था तथा साथ ही साथ भारत की सनातन हिंदू संस्कृति के प्रति गहरी निष्ठा और आदर विद्यमान था । दिल्ली के साहित्यकार आमोद कुमार ने कहा प्रतिष्ठित एतिहासिक चरित्रों पर नाटय रचना करना किसी सिद्धहस्त साहित्यकार के बस की ही बात है। श्री कृष्ण शुक्ल ने कहा कि ऐतिहासिक पात्रों को केंद्र में रखकर नाटक की रचना अत्यधिक शोध और अध्ययन के बाद ही की जा सकती है। वीरेन्द्र मिश्र इसमें सफल हुए हैं। अशोक विद्रोही ने कहा कि उनकी रचनाओं में देश के प्रति त्याग देश प्रेम की उदात्त भावना के रूप में देखने को मिलता है । राजीव प्रखर ने कहा कि उनका कहानी संग्रह पुजारिन मानवीय अन्तर्द्वंद्व की सशक्त शाब्दिक अभिव्यक्ति है। डॉ शोभना कौशिक ने कहा कि वीरेंद्र कुमार मिश्र की रचनाओं में जीवन के प्रति कर्मठता, निष्ठा व समर्पण की भावना विशेष रूप से परिलक्षित होती है ।
कार्यक्रम में दयानन्द आर्य कन्या महाविद्यालय के प्रबंधक उमाकांत गुप्त, अतुल कुमार शर्मा ( सम्भल), रचना मिश्र(इटौंजा ,लखनऊ), प्रदीप गुप्ता (मुम्बई), रंजना हरित ((बिजनौर), रेखा रानी (गजरौला), राजीव मिश्र, मधुप मिश्र, जिमी, रचना मिश्र, अर्जुन मिश्र(लखनऊ), नीरज मिश्र, गुरविंदर सिंह, रश्मि अग्रवाल (नजीबाबाद), मुजाहिद चौधरी ( हसनपुर), नेहा, शिवानी शर्मा (रामपुर), रेखा मिश्र, सुदेश आर्य, मंगलेश लता यादव आदि ने भाग लिया । आभार महेंद्र मिश्र ने व्यक्त किया ।

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